भाषा / Language
ना होकर भी होने का एहसास कल दिन भर रहा ।शुक्रिया उन दिल वाल…
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ना होकर भी होने का एहसास कल दिन भर रहा ।शुक्रिया उन दिल वाली smileys का जो दिन भर मेरी इर्द गिर्द तैरती रहीं बिना डोर वाली बिना छोर वाली । गुस्ताखियाँ सिर्फ मेरी नहीं थी जगजीत जी की ग़ज़लों की भी थी। मुझसे ज्यादा तुमको वो जीती हैं।
डायरी कभी कभी रूमानी भी लगती है... . और मैं शरारती 😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें