भाषा / Language
भूली बिसरी "पीतल" सी उमीदों पर
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भूली बिसरी "पीतल" सी उमीदों पर
आज फिर इक बार
अपने नूर का "नमक "छिड़का है
शिकवे - गिले की खट्टी "इमली "से
मल मल के खूब रगड़ा है
अब जो खालिस "सोने "सा
चमका निखरा है
उसका नाम मैंने "मुहब्बत "रखा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें