कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0807

भाषा / Language

भूली बिसरी "पीतल" सी उमीदों पर

भूली बिसरी "पीतल" सी उमीदों पर आज फिर इक बार अपने नूर का "नमक "छिड़का है शिकवे - गिले की खट्टी "इमली "से मल मल के खूब रगड़ा है अब जो खालिस "सोने "सा चमका निखरा है उसका नाम मैंने "मुहब्बत "रखा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें