ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0801

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अपना पसंदीदा प्रेम अनलिखा हो चाहे अनकहा भी.... अपनी तरफ ही…

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अपना पसंदीदा प्रेम अनलिखा हो चाहे अनकहा भी.... अपनी तरफ ही आता सा लगता है। हम बुद्धधु हैं क्या ? शब्दों से सपने देख लेते हैं। धत्त! 😊😊😊😊याद
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें