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रचना 0783

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बस दो कदम पर ही था हमारा कूचा

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बस दो कदम पर ही था हमारा कूचा मैं भी चुप रही .... पर तुमने भी तो कभी ना सोचा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें