कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0781

भाषा / Language

रोज़ इक तारा तोड़ती हूँ कि ये चाँद अकेला हो जाये

रोज़ इक तारा तोड़ती हूँ कि ये चाँद अकेला हो जाये कमबख्त रोज़ इक ग़ज़ल लिखता है कि मेला हो जाये 😊😊😊याद आज दिल शायराना... शायराना.... शायराना लगता है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें