कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0699

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इन खामोशियों को उधेड़ोगे तो मेरे शब्द नज़र आएंगे

इन खामोशियों को उधेड़ोगे तो मेरे शब्द नज़र आएंगे और फिर जब इन्ही शब्द को बुनोगे तो मेरी खामोशी जाल तो मैं शानदार बुन ही देती हूँ ... है ना ? और तुम फंस भी जाते हो .... है ना ? इस रात ने ....उस चाँद को न जाने ये कितनी बार कहा होगा और उस चाँद ने ....इस रात को न जाने कितनी बार फिर बुना होगा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें