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रचना 0697

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हर दिन जख्म नया , दर्द अपनों को खोने का

हर दिन जख्म नया , दर्द अपनों को खोने का जिंदगी सीख ले ,तू भी फन बे-अश्क रोने का खला से पूछ बैठी , एक दिन खलिश यूँ ही ये माज़रा क्या है ...होने का और न होने का ? गुलाब की पंखुरियों से सूख गए ख्वाब मेरे सिरहाना मुझे ,मैं वक़्त खोजता रहा सोने का तकनीक ने किताब छीनी , बचपन खा गयी "फ़ालतू" इक तखल्लुस लग गया ,खिलोने का काटना ही है पेट इस बरस भी यक़ीनन तुझको ढोंग क्यों करता है उमींद वाला बींज बोने का ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें