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रचना 0638

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एक बूंद स्याही से

एक बूंद स्याही से .... आसमान तो नीला कर दिया मैंने पर ...सांझ सिंदूरी करने के लिए मुझे एक सुर्ख़ ह्रदय तोडना होगा फिर जो रंग मेरी उँगलियों के पोरों से रिसेगा मेरी अँखियों के कोनों में रुकेगा वही ....सिर्फ वही कालजयी कविता भी रंगेगा और कोरा कैनवास भी एक साथ ....बारी बारी अगले कई सदियों तक जादू .....शुरू होने को है सुनो! आँखें मीच लो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें