भाषा / Language
इक कविता रोज़ मेरे बगल में आ बैठती है और रोज़ यही सवाल पूछती…
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इक कविता रोज़ मेरे बगल में आ बैठती है और रोज़ यही सवाल पूछती है .... क्या मुझे लिख रही हो कल्पना ?
और मैं रोज़ कह देती हूँ..."नहीं उसे "।
फिर अगले दिन मुस्कुराती वही कविता ....फिर वही सवाल
कुछ इस तरह से मैंने किसी को अपने पास रोक रखा है ।😊😊😊😊😊 बस कविता को मत बताइयेगा😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें