कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0609

भाषा / Language

बार बार ....तोड़ कर

बार बार ....तोड़ कर मुझे गिराने से बेहतर फिर मरोड़ कर ...कहीं भी अटकाने से बेहतर अब .... "मैं " .....चलना पसंद करूँगी उस दरख़्त की ओर .... जो बिना पत्तों के भी अपनी छाप छोड़ रहा है मेरी तरह .....इक वजह ढूँढ रहा है उमींद रोपने की ...जगह ढूँढ रहा है यकीं है मुझे ...ढूँढ लेंगे हम "खुद " को .....संग रहते "मैं ".....पतझर रहते और .... "वो "....मेरे रहते कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें