भाषा / Language
कहाँ कुछ कर पाती हूँ तुम्हारे लिए
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कहाँ कुछ कर पाती हूँ तुम्हारे लिए .......
बस .....ये रात
ये दिन
ये सुबह
ये शाम
खुद से तोड़ कर
तुम्हारे सुपुर्द कर देती हूँ ......dear ज़िन्दगी 😊😊😊
अब तो मेरी तरह मुस्कुरा ज़िन्दगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें