कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0601

भाषा / Language

कहाँ कुछ कर पाती हूँ तुम्हारे लिए

कहाँ कुछ कर पाती हूँ तुम्हारे लिए ....... बस .....ये रात ये दिन ये सुबह ये शाम खुद से तोड़ कर तुम्हारे सुपुर्द कर देती हूँ ......dear ज़िन्दगी 😊😊😊 अब तो मेरी तरह मुस्कुरा ज़िन्दगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें