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रचना 0583

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ये रोज़ाना कौन मर जाता है दिनभर की ख्वाइशों के साथ

ये रोज़ाना कौन मर जाता है दिनभर की ख्वाइशों के साथ ? और कौन है जो अगली सुबह फिर पालना झुलाता है ? शायद .... उमींद होगी मुझमें लिपटी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें