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रचना 0557

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टूटी हुई चीज़ों को पन्नों में संजोने का शौक है मुझे

टूटी हुई चीज़ों को पन्नों में संजोने का शौक है मुझे तभी तो ... कितनी बार कुरेदा है तुम्हें ना जाने कितनी बार बोया है मेरा कागज़.... यूँ ही नहीं लशकारे मारता
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें