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रचना 0549

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इस फेर आओ तो

इस फेर आओ तो .... अपना समंदर वाला इत्र साथ लेते आना वो आ आ कर जाने वाली जा जा कर आने वाली.... महक चाहिए थी इश्क़ का लिबास.....इक दफ़ा मैं भी तो पहनूँ थोड़ा समंदर .......मैं भी तो हो लूँ वो इत्र .......मैं भी तो जी लूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें