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रचना 0524

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ना जाने कब निकला ……..चाँद

ना जाने कब निकला ……..चाँद तेरी बातों में मेरी रातों में ना जाने कब फिसला ………चाँद तेरे सुरूर में मेरे नूर में ना जाने कब पिघला ……….चाँद तेरे अरमानों में मेरे फरमानो में ना जाने कब बिखरा ………चाँद तेरी शह में मेरी मात में ना जाने कब उलझा ………चाँद तेरी हां में मेरी ना में ना जाने कब बिगड़ा ………चाँद तेरी परेशानी में मेरी नादानी में ना जाने कब बिछड़ा ……..चाँद शुक्र है …… वो ख्वाब था कतरा – कतरा “चाँद” का कुछ तेरी मुठ्ठी , कुछ मेरी हथेली मिला हमारा “चाँद ” …… सलामत पसरा तेरे – मेरे सिरहाने मिला शरद पूर्णिमा का चाँद आप सभी को मुबारक ..... बस यूँ ही हम पर झुका रहे ....😊😊😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें