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रचना 0508

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दिन के उठने से कई घंटों पहले

दिन के उठने से कई घंटों पहले.... अपना सूरज उगा लेती हो और देर रात तक..... इन तारों को बुहारती रहती हो ज़िन्दगी....... तुम भी "औरत" हुए जा रही हो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें