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रचना 0483

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मेरे सपनों का भारत वो नहीं

मेरे सपनों का भारत वो नहीं , जो ग्लोब में दीखता है वो तो .....यहाँ मेरे "मन "में बसता है तीन रंगों में उभरता हुआ संस्कृति से निखरता हुआ स्वर्णिम भविष्य रचता हुआ सबके दिलों में बसता हुआ हर दिन इतिहास रचता हुआ उन्नति के प्रयास करता हुआ राग द्वेष से बचता हुआ हरियाली से संवरता हुआ अनेकता में एकता धरता हुआ बस सूरज सा चमकता हुआ सब के साथ चलता हुआ आगे ही आगे बढ़ता हुआ सपनों का भारत ..... आँखों से नहीं मन से दीखता है और मन में ही बसता है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें