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रचना 0480

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ज्यादातर रोज़

ज्यादातर रोज़ ..... हम शरीर तो पहन लेते हैं आत्मा टांकना भूल जाते हैं ये living beings कौन होते हैं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें