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रचना 0457

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मन बांवरा नहीं

मन बांवरा नहीं , पारदर्शी हो चला है कुछ गिरहें खोलने , कुछ समेटने चला है आज फिर कुछ कहने , कुछ सुनने चला है फिर वो चुपचाप उड़ने , तुझे छूने चला है पानी था अब तलक, अब प्यासा हो चला है कुछ तुझसे होता हुआ , मुझ तक चला है मैं तुझमें मुकम्मल, मसरूफ तू मुझमें हो चला है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें