कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0443

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कुछ अरसा पहले तक मैं सोचती थी की ख्वाइशें दिलोदिमाग में बुन…

कुछ अरसा पहले तक मैं सोचती थी की ख्वाइशें दिलोदिमाग में बुनी जाती हैं पर उनका मुकम्मल होना लकीरों की हाथ में होता है | मैं भी बस इसी को सच समझ कर जिए जा रही थी | बस यूँ ही इक दिन इक शख्शियत को सुनने का मौका मिला और ये जाना कि ये सही है ख्वाइशें दिलोदिमाग में बुनी जाती है पर उनका मुकम्मल होना हमारी सोच पर निर्भर करता है हमारा अस्तित्व हमारी सोच है रुख बदल के रख दिया और तब से आज तक इसे हर दिन सच होता देख रही हूँ बल्कि दिन रात जादू होता देख रही हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें