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रचना 0422

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कश्मकश ये नहीं कि

कश्मकश ये नहीं कि ... मैं कितने पग आगे बढ़ूँगी या कितने पग तुम्हारे अपनी तरफ बढ़ाने दूँगी कश्मकश ये है कि ... मैं किस हद तक तुम्हें जी सकुंगी... सुनो ख़्वाबों .... तुमसे कह रही हूँ ... मैं आ रही हूँ....
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें