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रचना 0313

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मेरी कलम कुछ यूँ बोली ......चित्र को देख कर

मेरी कलम कुछ यूँ बोली ......चित्र को देख कर उमींद का बुलबुला ....फिर आँख से झरा आज पात पर नहीं अटका ना ही ....साख पर फूटा फुदकता रहा ....दिन भर कभी आधी रोटी पर बैठा कभी कुचैले बिस्तर पर लोटा कभी टूटे खिलौने संग खेला कभी फटी पतंग संग दौड़ा टहलता रहा .... इक रूपैया मुट्ठी में भींचे कभी सिले आसमान के ऊपर कभी उधड़ी छत के नीचे पसरा भी .... भूखा प्यासा ... पराई हथेलियों के सामने पर ....फिर उड़ चला अपना "मैं "बचाने फिर नयी उमींद फुगाने इस बार ... दूसरी आँख के जल वाला इक बेहतर कल वाला उमींद का बुलबुला .... कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें