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रचना 0279

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वक़्त नहीं

वक़्त नहीं ..... ये यादों के उजाले जाने कौन सी उम्मीद लिए मेरा दर खटखटा रहे हैं ? जानते है ..... कि मुझमें छाया हुआ है "कोहरा" मसरूफियत का , भागती दौड़ती ज़िन्दगी का वक़्त ही नहीं , कि मैं वो अपनापन दे सकूँ वही पुराना , दीवानापन दे सकूँ वजह भी नहीं , अब जगह भी नहीं , तितलियों सी यादों को सजाने के लिए, सिरहाने में बसाने के लिए, फिर किस्मत आज़माने के लिए , एक बार फिर दूर जाने के लिए © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें