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रचना 0271

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ख्वाब ....मेरे हमराह भी

ख्वाब ....मेरे हमराह भी करते मुझे .....गुमराह भी जीवन .... ख्वाइशों सा .....हरा भरा इक ख्वाब पूरा हुआ तो ..... इक उग आया .... ज़रा ज़रा ख्वाब ..... रोज़ उगते ... पलते ... मिटते हैं गर अधूरे रहे .... तो आँख से रिसते हैं © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें