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रचना 0268

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बड़ा ही "बेवजह" दिन गुज़र जाता है

बड़ा ही "बेवजह" दिन गुज़र जाता है जब .... अपनी ही आवाज़ "अनसुनी " लौट आती है अपने ही लफ्ज़ समेटने पड़ते हैं ..... किसी बैरंग लिफ़ाफ़े में बस भरने पड़ते हैं...... "सिर्फ तुम्हारे लिए" .... लिखकर रखने पड़ते हैं ..... इसे ... "इंतज़ार" कहूँ ? या .... "तन्हाई" नाम दूं ? या ... पलट के "उमींद" की इक पुकार और .... फ़िज़ा में भर दूं ? © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें