कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0257

भाषा / Language

प्रेम का कोई रंग नहीं ......न ही कोई खनक

प्रेम का कोई रंग नहीं ......न ही कोई खनक फिर कैसे छोड़ आता है अपनी छाप बताओ न ..... कैसे सुना आता है अपनी चाप प्रेम का कोई आकार नहीं ....न ही कोई गंध फिर कहाँ रख पाता है इतने एहसास बताओ न ..... कैसे दे आता है सगरे आभास प्रेम का कोई पता नहीं .....न ही कोई प्रारूप फिर कैसे सटीक दर पर है धरता अर्ज़ी बताओ न कैसे है इतनी करता मनमर्जी प्रेम का कोई आदि नहीं.... न ही कोई अंत फिर कैसे जो क़तरा है , समुंदर भी है बताओ न जो सामने है , वो कैसे अंदर भी है कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें