कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0235

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मेरा सब कुछ

मेरा सब कुछ...... चाँद अधूरा भी खूबसूरत , पूरा हो तो नायाब ख्वाब कम तो सुकून , पूरे हों तो कामयाब मेरी ज़िन्दगी ....... मेरा मुकाम सुरमई शाम में , चमकता वो ताज़महल कभी अजूबा , कभी मज़ार सा हमशक्ल मेरी यादें ...... मेरा सामान कभी जागा , कभी सोया सोया परियों संग दिखे मचलता , कभी यूँ ही तनहा सिकुड़ता मेरा मन ........मेरा भगवान् शोख दिल कहो , या कहो रोशन बहार कभी रूह से , कभी इंसा से करती हूँ इज़हार मेरी मुस्कान ......मेरी पहचान मिलते बिछड़ते हम , जैसे घडी की सूइयां धूप पड़े और थक जाऊ , मेरे बादल दे छैय्यां मेरे साथी .......मेरा गुमान अनगिनत तारों सी , मेरी कामनाएं ओढ़ता हर दिन इक तारा , मेरी झोली में छोड़ता मेरा हमसफ़र ........मेरा आसमान सादा दिल , सादे उदगार शायद दोस्त बनाने चले आते हैं विचार मेरी कल्पना ........ मेरा अभिमान कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें