कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0185

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कल रात

कल रात.... चाँद को ......आँखों में तैरते देखा कौन कहता है .... ख्वाइशें ......छुई नहीं जाती देखो ..... छू के आ रहे हैं क़तरा क़तरा...... चाँद लकीरों में पा रहे हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें