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रचना 0181

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इक सिरा ख़्वाबों का

इक सिरा ख़्वाबों का भींचे बैठी हूँ इस पार..... दूसरा सिरा अब भी तलाश रहा तुम्हें उस पार......
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें