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रचना 0176

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तुम्हारी तलब के ......औंधे पड़े पैमाने

तुम्हारी तलब के ......औंधे पड़े पैमाने क्या छू बैठे ...... बेनूर कलम भी ......सुर्ख एहसास पिरोने लगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें