ककल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0171

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दोराहे

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दोराहे……. आज फिर खड़ी हूँ दोराहे पर आते जाते लम्हों के बीचों बीच ……. इक तरफ …… मलबा बिखरा पड़ा है मेरे पुराने अतीत का उजले धुंधले दिनों का सूखे गीले पलों का ऊँची नीची तान का उठती टूटती उड़ान का रूठते मनते रिश्तों का सुख दुःख की किश्तों का मिलती फिसलती जीत का बिखरे सुरीले गीत का जलती बुझती कल्पना का जाती आती तृष्णा का आधी पूरी ख्वाइशों का इत्तू इतनी फरमाइशों का दूसरी तरफ ……. समंदर बिखरा पड़ा है सुकून भरी घड़ियों का उत्साह लदी लड़ियों का मेरी सुर्ख उमींद का ख़्वाबों के मुरीद का उजली उजली आशा का सोच नयी परिभाषा का बंधे कसे हम तुम का नयी ग़ज़ल की तर्रनुम का नए कोरे जतनों का तेरे मेरे प्रयत्नों का सुनहरे व्यक्तित्व वालों का कई अनसुलझे सवालों का इक दूजे के भविष्य का प्रखर सोचते मनुष्य का बीते कल के मलबे पर खड़ी हूँ..... आने वाले कल के सपने टांक रही हूँ बीते कल के झरोखे से ...... आने वाले कल को झाँक रही हूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें