कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0124

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देव

देव...... क्या जिद्द पाले बैठे हो .....देव सम्भलो .....रुको तो सही मत बांधो एहसासों के पाँव में शब्दों के घुंघरू ये बेरब्त हुए जा रहे है थम जाओ .....देव समझ जाओ....देव ये आसक्त हुए जा रहे हैं जख्मी कर देंगे ये खनक के ऐसे ही यहाँ वहाँ भटक के सुनो ......देव मान भी जाओ .....देव बंद करो ये शोर एहसासों का ये वक़्त नहीं ऐसी बातों का दर्पण उठाओ .......देव देखो तो सही जो अंतस में तुम्हारे मैं वो रत्ती भर भी नहीं अब बस भी करो ......देव चुप हो जाओ अर्ज़ सुन लो ......देव जानते हो न मुझे मौन की आदत है यही बस ....यही कर जाओ ........देव बस ऐसे ही सिमट जाओ .......देव मेरी चुप से लिपट जाओ ......देव A new style of expression . 😃😃😃😃😃
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें