भाषा / Language
फ़िज़ूल कोशिश करती हूँ
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फ़िज़ूल कोशिश करती हूँ
उन यादों को खुरचने की
जो इक उम्र पहले
मैंने खुद उकेरी थी
बड़े नाज़ से ........
और
फख्र रखती हूँ
की बूढ़ी बदरंग होकर भी
ये यादें सजी बैठी हैं मुझमें
पाले बैठी हैं
इक जिद्द ......
इक आरजू .......
की मैं उन्हें जिला दूंगी
वक्त की धूल उडा दूंगी
प्रेम की कूंची फिरा दूंगी
फिर अपने अंतस में बसा लूंगी
करीब और करीब
दिल के बिलकुल पास
वो वाली जगह दूँगी
मेरी थी .....
मेरी हो ......
मेरी ही रहोगी .....
बता दूँगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें