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रचना 0117

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आज जरा नहीं भा रही

आज जरा नहीं भा रही ये बरखा की बूंदें मुझे चाहे कितनी ही रूमानी हो चाहे कितना खुशगवार कर रही हो इश्क का मौसम मुस्कान ला रही हो प्रेम के होठों पर भीगा रही हो मुहब्बत को ज़ार ज़ार जानती हूँ ...... इक दीवाना कहीं दूर रो रहा है इसकी बेमौसम इनायत पर 😞😞😞😞😞😞😞😞
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें