भाषा / Language
ये कलम भी न
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ये कलम भी न !
बड़ी नखरीली है
एक भी दिन
अगर तवज्जो न पाये
तो मुंह फुला लेती है
"मेहबूबा" की तरह
लाख एहसासों की
रोशनाई उलट दो
पिघलती ही नहीं
हर दिन का
स्पर्श चाहती है मेरा
कैसे बताऊँ ?
कैसे समझाऊँ ?
इस बांवरी को
ज़िन्दगी की
भागमभाग को छल कर
मसरूफियत से छिपकर
पलों को छीनकर
उससे इश्क है मेरा
और शायद इश्क़ियत भी
चल ! अब मान भी जा
कुछ मोती बिखेर अपने
ताकि सुकून पा सकूँ
तेरी खुश्बू से महक सकूँ
थोडा सा चहक सकूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें