कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0105

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ये कलम भी न

ये कलम भी न ! बड़ी नखरीली है एक भी दिन अगर तवज्जो न पाये तो मुंह फुला लेती है "मेहबूबा" की तरह लाख एहसासों की रोशनाई उलट दो पिघलती ही नहीं हर दिन का स्पर्श चाहती है मेरा कैसे बताऊँ ? कैसे समझाऊँ ? इस बांवरी को ज़िन्दगी की भागमभाग को छल कर मसरूफियत से छिपकर पलों को छीनकर उससे इश्क है मेरा और शायद इश्क़ियत भी चल ! अब मान भी जा कुछ मोती बिखेर अपने ताकि सुकून पा सकूँ तेरी खुश्बू से महक सकूँ थोडा सा चहक सकूँ
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें