कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0098

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बसंत

बसंत...... इस बार का "बसंत" मुझमें में आ जाये ठीक उस प्रकृति की तरह मेरी चेतना के फूल भी खिल सकें वो बंद कली ख्वाइशों की .... वो बींज सी आतुरता सपनों की .... वो नाज़ुक कोपलें ख़्वाबों की ..... वो नूतन मंजरी अरमानों की .... वो फलने वाली बौर हसरतों की .... सब जमना चाहते हैं इस बसंत सिर्फ और सिर्फ मुझमें....... लदना चाहते हैं बसंती कल्पना के फूल सिर्फ और सिर्फ मुझमें ....., लाओ.... मल लूं कुछ किसलय उमंगें कभी तन पर कभी मन पर और दे दूं स्वयं को इक उपहार खिल सकूँ रत्ती भर और बिखेर सकूँ मुस्कान इस धरा पर ठीक उस बसंत की तरह हर वर्ष वाले उस अनंत की तरह
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें