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रचना 0087

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सरक रहा है साल

सरक रहा है साल आहिस्ता आहिस्ता हसीं यादों का बांधे हुए गुलदस्ता नयी सोच ,नए रिश्तों से हुआ बाबस्ता कभी रूठा भी , पर गुज़रा हँसता हँसता
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें