भाषा / Language
ये "शब्द" तो
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ये "शब्द" तो
बड़े सरल से थे
फिर "जुबान" से
निकल कर
"दिल" तक
और दिल से
" दिमाग" तक के
दरमियान
इतने स्वरुप
इतने अर्थ
इतने अभिप्राय
इतने भाव
बदल डाले
की अब
जटिल से
बिलकुल अजनबी
बेमोल
स्वार्थी
और
निहायत ही
खुदगर्ज़
प्रतीत हो रहे हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें