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रचना 0046

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इक तेरा ही ख्वाब ,ताबीर में ढला नहीं

इक तेरा ही ख्वाब ,ताबीर में ढला नहीं कैसे कहें ,कोई खलिश ,कोई खला नहीं हवा और पानी तो , बटोर मैं भी लायी उमींद उगाती ,तू ही आफताब मिला नहीं कस कस पड़ी हैं ,मुफलिसी की धूप हम पर कुछ है हममें पत्थर , वो अब तक गला नहीं लपटें थक गयी , ये हवाएं भी रो पड़ी सब्र जल गया , वजूद अब भी जला नही. ठूंठ से पेड़ ,कैसी तृष्णा ?कैसा प्यार? इनके नीचे आज तक कोई फला नहीं यादों को खेते हुए , हम बूढे हो आये तू कैसा मांझी ? जो अब तक चला नहीं माँ की दुआएं ....रईस ,बरकतों वाली उस रोज़ जब रब का सिक्का चला नहीं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें