भाषा / Language
इक तेरा ही ख्वाब ,ताबीर में ढला नहीं
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इक तेरा ही ख्वाब ,ताबीर में ढला नहीं
कैसे कहें ,कोई खलिश ,कोई खला नहीं
हवा और पानी तो , बटोर मैं भी लायी
उमींद उगाती ,तू ही आफताब मिला नहीं
कस कस पड़ी हैं ,मुफलिसी की धूप हम पर
कुछ है हममें पत्थर , वो अब तक गला नहीं
लपटें थक गयी , ये हवाएं भी रो पड़ी
सब्र जल गया , वजूद अब भी जला नही.
ठूंठ से पेड़ ,कैसी तृष्णा ?कैसा प्यार?
इनके नीचे आज तक कोई फला नहीं
यादों को खेते हुए , हम बूढे हो आये
तू कैसा मांझी ? जो अब तक चला नहीं
माँ की दुआएं ....रईस ,बरकतों वाली
उस रोज़ जब रब का सिक्का चला नहीं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें